यह हमेशा एक मुश्किल सवाल होता है कि मनोविज्ञान के इतिहास की शुरुवात कहाँ से मना जाये । कुछ लोग पुराने ग्रीस से शुरू करेंगे; दूसरे 19वीं सदी के आखिर में उस समय से देखेंगे जब मनोवैज्ञानि विषयों का अध्ययन वैज्ञानिक विधियों के साथ और अलग से एक प्रयोगशाला से सुरुवात किया गया।
आधुनिक मनोविज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर हम गौर करे तो हम पाएंगे की मनोविज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में एक नया क्षेत्र है जो कुछ साल(145) ही पुराना है।इससे पहले भी मनोविज्ञान से सम्बंधित विषयों पर लोगों ने ध्यान दिया है और अध्ययन किया है| बस अंतर ये था की उस समय वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता था
उस समय ऐसे दार्शनिक,* मेडिकल डॉक्टर और फिजियोलॉजिस्ट थे जिन्होंने मनोविज्ञान के अलावा और किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचा—खासकर लोगों के बारे में। प्लेटो, अरस्तू और डेसकार्टेस जैसे दार्शनिकों ने इंसानी दिमाग और उसके शरीर से संबंध को समझने या समझाने की कोशिश की।
देखा जाये तो मनोविज्ञान के इतिहास को दो दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। पहला दार्शनिक दृष्टिकोण और दूसरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण ।
दार्शनिक दृष्टिकोण
मनोविज्ञान का भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण :-
प्राचीन भारत में मनोविज्ञान किसी पृथक विषय के रूप में विकसित नहीं हुआ था , बल्कि यह दर्शन, योग और आध्यात्मिक चिंतन का अभिन्न अंग था। मन, बुद्धि, चेतना, और व्यक्तित्व जैसे विषयों के बारे में जो बाते प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में कहीं गयीं हैं, वो आज के आधुनिक मनोविज्ञान के सिद्धांतों से काफी गहराई से सम्बंधित हैं। इन सभी बातों को हम निम्न काल खण्डों के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे।
1. वेद (1500–1000 ईसा-पूर्व)
वेद केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं हैं बल्कि इसमें मानव मन एवं व्यवहार का गहन अध्ययन मिलता है । इसमे भारतीय ऋषियों ने यह बताया है की मनुष्यों का व्यवहार बाहरी परिश्थितियों के साथ साथ उसके आतंरिक मानसिक प्रक्रिओं द्वारा नियंत्रित होता है । यह विचार आज के मनोविज्ञान का आधार है ।
1.1 मन (Mind):- वेदों के अनुसार मन इंद्रियों और चेतना के बीच एक सेतु की तरह होता है। वेदों के अनुसार मन की कुछ विशेषताएं होती है जो निम्न हैं ।
- मन इंद्रियों से प्राप्त सूचनाओं को ग्रहण करता है
- मन इच्छा, भावना और संकल्प उत्पन्न करता है
- मन चंचल और परिवर्तनशील होता है
यदि हम मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो हम पते है की आधुनिक मनोविज्ञान में मन बाहरी उत्तेजनाओं (Stimuli) को ग्रहण कर प्रतिक्रिया (Response) उत्पन्न करता है। उक्त बातों को यदि हम ध्यान दें तो हम पाते हैं की वेदों में उल्लेखित मन की अवधारण आज की संज्ञानात्मक प्रक्रिया(Cognitive Process) की अवधारणा से काफी मेल खाता है।
1.2 बुद्धि :- निर्णय और विवेक का केंद्र
बुद्धि को वेदों में मन से उच्च स्तर का तत्त्व माना गया है और बुद्धि के द्वरा, सही–गलत का निर्णय ,तर्क और विवेक,मन पर नियंत्रण जैसे कार्यों को संपन्न किया जाता हैं ।
यदि हम आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो हम पते हैं की आधुनिक मनोविज्ञान में बुद्धि को निर्णय लेने की क्षमता ,तर्क करने की क्षमता, आत्म-नियंत्रण आदि क्षमताओं के रूप में परिभाषित किया जाता है।
बुद्धि के बारे में दोनों ही बाते लगभग सामान है ।
1.3 चेतना:- जागरूकता की अवस्था
वेदों में चेतना को सबसे सूक्ष्म और मूल तत्त्व माना है। वेदों के अनुसार,चेतना एक ऐसा तत्त्व है जिसके बिना मन और बुद्धि निष्क्रिय हैं,चेतना ही अनुभव का आधार है और चेतना साक्षी रूप में कार्य करती है । वेदों में यह स्पष्ट रूप से मिलाता है कि चेतना मानव अनुभव की जड़ है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से आधुनिक Consciousness Studies में चेतना को, जागरूकता,व्यक्तिगत अनुभव आदि के रूप में समझा जाता है। वेदों के अनुसार मानसिक प्रक्रिया एक क्रम में कार्य करती है जो निम्नवत है ।
चेतना (Awareness)→मन (Thoughts & Emotions)→ बुद्धि (Judgment & Control)→ व्यवहार (Behaviour)
यह क्रम आज के Behavioural और Cognitive Psychology Models से अत्यंत साम्य रखता है।
2. उपनिषद (800–500 ईसा-पूर्व)
“जब मन अहंकार से जुड़ जाता है, तब बंधन उत्पन्न होता है।” (उपनिषदिक विचारधारा)
जब हम आज मानसिक तनाव, व्यक्तित्व संकट और आंतरिक अशांति की बात करते हैं, तो सामान्यतः हमारा ध्यान आधुनिक मनोविज्ञान की ओर चला जाता है। लेकिन हमें ये जानकर बहुर आश्चर्य होगा कि इन समस्याओं की जड़ को समझने का प्रयास भारत में उपनिषदों के माध्यम से हजारों वर्ष पहले ही किया जा चुका था। उपनिषदों में मानव मन और व्यक्तित्व को लेकर जो दृष्टि मिलती है, वह न केवल दार्शनिक है, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से मनोवैज्ञानिक भी है।
उपनिषद मनुष्य को शरीर या सामाजिक पहचान के रूप में देखने के साथ साथ वे उसे चेतना, मन, अहंकार और बुद्धि के जटिल संबंधों के माध्यम से भी समझते हैं। यही कारण है कि उपनिषदिक चिंतन आज की Personality Psychology और Stress Psychology से गहराई से जुड़ता हुआ दिखाई देता है।
उपनिषदों के अनुसार आत्मा मानव अस्तित्व का मूल है। आत्मा को शुद्ध चेतना कहा गया है, जो न तो विचारों से प्रभावित होती है और न ही भावनाओं से। आत्मा केवल साक्षी है—देखने वाली। जब मनुष्य अपने भीतर घटने वाले विचारों और भावनाओं को देख पाता है, बिना उनमें पूरी तरह डूबे, तभी वह मानसिक रूप से संतुलित रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान में जिसे आज self-awareness या observer self कहा जाता है, वही अवधारणा उपनिषदों में आत्मा के रूप में दिखाई देती है।
इसके विपरीत मन वह स्तर है जहाँ विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ और कल्पनाएँ जन्म लेती हैं। उपनिषदों ने मन को स्वभाव से चंचल बताया है। मन कभी अतीत में भटकता है, कभी भविष्य की चिंता करता है। आज Cognitive Psychology भी यही मानती है कि मन लगातार विचारों की धारा है और यही विचार हमारी भावनाओं को आकार देते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो उपनिषद मन की प्रकृति को बहुत पहले ही समझ चुके थे।
समस्या तब शुरू होती है जब मन अहंकार से जुड़ जाता है। अहंकार उपनिषदों में “मैं” और “मेरा” की भावना है। यह वह स्तर है जहाँ व्यक्ति अपनी पहचान बनाता है—मैं कौन हूँ, मैं कितना सफल हूँ, लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में यही Self-concept है। जब व्यक्ति अपनी पूरी पहचान इसी Self-concept पर टिका देता है, तब वह बाहरी परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होने लगता है। प्रशंसा मिलने पर सुख और आलोचना मिलने पर दुख—यह सब अहंकार-आधारित मन की ही परिणति है।
उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है कि जब मन अहंकार से जुड़ जाता है, तब बंधन उत्पन्न होता है। यह बंधन कोई बाहरी कैद नहीं है, बल्कि मानसिक कैद है। आधुनिक Stress Psychology में इसे ego-identification कहा जाता है। जब व्यक्ति स्वयं को अपने विचारों, भावनाओं और सामाजिक छवि तक सीमित मानने लगता है, तब तनाव, चिंता और भय स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं।
यह विचार विशेष रूप से याज्ञवल्क्य से जुड़ी उपनिषदिक परंपरा में बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। याज्ञवल्क्य का दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि समस्या संसार में नहीं, बल्कि उस दृष्टि में है जिससे हम संसार को देखते हैं। जब दृष्टि अहंकार-केंद्रित हो जाती है, तब मन अशांत हो जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में बुद्धि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपनिषदों में बुद्धि विवेक का प्रतीक है। यही वह शक्ति है जो मन को दिशा देती है और अहंकार पर नियंत्रण रखती है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे self-control या executive function कहा जाता है। जब बुद्धि सशक्त होती है, तब व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं पर प्रतिक्रिया देने से पहले उन्हें समझ पाता है। यही मानसिक परिपक्वता का आधार है।
आज की Personality Psychology जिन गुणों को स्वस्थ व्यक्तित्व का आधार मानती है—जैसे आत्म-जागरूकता, भावनात्मक संतुलन और आत्म-नियंत्रण—वे सभी उपनिषदिक दृष्टि में पहले से मौजूद हैं। इसी प्रकार Stress Psychology में जिस mindfulness और detachment की चर्चा होती है, उसका मूल विचार भी उपनिषदों में मिलता है।
इस प्रकार उपनिषदों का आत्मा-मन-अहंकार का सिद्धांत केवल आध्यात्मिक नहीं है, बल्कि यह मानव मन को समझने का एक गहरा मनोवैज्ञानिक ढाँचा प्रस्तुत करता है। आज जब मानसिक तनाव एक वैश्विक समस्या बन चुका है, तब उपनिषदिक दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि शांति बाहरी नियंत्रण से नहीं, बल्कि आंतरिक विवेक से आती है। यही कारण है कि उपनिषद आज भी प्रासंगिक हैं—न केवल दर्शन के क्षेत्र में, बल्कि आधुनिक मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य की समझ में भी।
3.पतंजलि का योग और चित्त की अवधारणा (लगभग 500 ईसा-पूर्व)
प्राचीन भारतीय दर्शन में पतंजलि का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने योग नामक एक ऐसी वैज्ञानिक और व्यावहारिक पद्धति प्रस्तुत की, जिसके द्वारा मन को नियंत्रित किया जा सकता है।
पतंजलि ने बताया कि योग —
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
अर्थात् योग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मन में उठने वाली चंचल वृत्तियों को नियंत्रित किया जाता है।
चित्त का मनोवैज्ञानिक स्वरूप
पतंजलि ने चित्त को केवल मन नहीं माना, बल्कि इसे मानसिक क्रियाओं की पूर्ण प्रणाली के रूप में समझाया। चित्त में चार तत्त्व शामिल हैं—
- मन – विचारों और भावनाओं का केंद्र
- बुद्धि – निर्णय और विवेक की शक्ति
- अहंकार – “मैं” की भावना
- स्मृति – पूर्व अनुभवों का संग्रह
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चित्त वह मानसिक संरचना है, जो सोच, अनुभव और व्यवहार को संचालित करती है।जब चित्त की वृत्तियाँ अनियंत्रित होती हैं, तब व्यक्ति—तनाव, चिंता, भय एवं अवसाद का अनुभव करता है। पतंजलि का योग इन वृत्तियों को शांत करने की प्रक्रिया है, न कि विचारों को दबाने की तकनीक।
आज मनोविज्ञान विशेषकर नैदानिक मनोविज्ञान(Clinical Psychology), मानसिक समस्याओं के उपचार में –ध्यान (Meditation), योग, माइंडफुलनेस जैसी तकनीक का प्रयोग तनाव, चिंता और अवसाद के उपचार में काफी बड़े पैमाने पर कर रहा है।
4. त्रिगुण सिद्धांत और व्यक्तित्व (लगभग 400 ई.)
भारतीय दर्शन में व्यक्तित्व को किसी एक स्थिर गुण का परिणाम नहीं, बल्कि सत्व, रज और तम—इन तीन गुणों के आपसी संतुलन से निर्मित माना गया है। प्रत्येक व्यक्ति में ये तीनों गुण, अलग- अलग अनुपात में विद्यमान रहते है विद्यमान होते हैं । ये अनुपात ही व्यक्ति के स्वभाव, व्यवहार और मानसिक प्रवृत्तियों को निर्धारित करता है।
सत्व गुण:-इस गुण की प्रधानता वाले व्यक्ति शांत, संयमित और स्पष्ट सोच वाले होते हैं। उनमें आत्म-नियंत्रण, सकारात्मक दृष्टिकोण और सीखने की प्रवृत्ति जैसे गुण पाए जाते हैं ।
मनोवैज्ञानिक रूप से यह गुण emotional stability, self-awareness और healthy adjustment से जुड़ा है। ऐसे व्यक्ति मानसिक तनाव को बेहतर ढंग से संभाल पाते हैं।
रज गुण:-इस गुण की प्रधानता वाले व्यक्ति क्रियाशील, महत्वाकांक्षी और लक्ष्य-केंद्रित विशेषता वाले होते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रज गुण achievement motivation, high energy और कभी-कभी anxiety से संबंधित है। रज की अधिकता व्यक्ति को बेचैन और असंतुलित बना सकती है।
तम गुण :- तम गुण की प्रधानता, व्यक्ति में आलस्य, भ्रम और उदासीनता को जन्म देती है। ऐसे व्यक्ति निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करते हैं।
भारत में मनोविज्ञान का विकास जीवन, अनुभव, शिक्षा, चिकित्सा और आध्यात्मिक चिंतन से हुआ।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण (400–800 ई.)
इस काल में मन और शरीर दोनों को एक माना गया अर्थात मन शारीर से भिन्न नहीं है । आयुर्वेद में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को एक दुसरे से संबंधित बताया गया। सत्त्व, रजस और तमस के आधार पर मानसिक प्रवृत्तियों का वर्णन किया गया। उन्माद, अपस्मार और चिंता जैसे मानसिक विकारों की पहचान की गई। उपचार में औषधि के साथ-साथ आचरण, दिनचर्या और परामर्श को भी आवश्यक माना गया। यह दृष्टिकोण आज की क्लिनिकल और होलिस्टिक साइकोलॉजी से मेल खाता है।
बौद्ध एवं जैन चिंतन (400–900 ई.)
इस काल में मन को परिवर्तनशील माना गया। ध्यान के माध्यम से मन को नियंत्रित करने की विधियाँ विकसित हुईं। व्यवहार और कर्म के संबंध को स्पष्ट किया गया। मानसिक दुख को अज्ञान और असंतुलित चेतना का परिणाम माना गया। यह विचार आधुनिक संज्ञानात्मक और व्यवहारात्मक मनोविज्ञान की आधारभूमि जैसे प्रतीत होते हैं।
अद्वैत और भक्ति परंपरा (800–1400 ई.)
इस काल में आत्मा, अहंकार और चेतना पर गहन विचार हुआ। आदि शंकराचार्य ने अहंकार को मानसिक बंधन का कारण बताया और आत्मबोध को मानसिक मुक्ति का साधन माना। भक्ति आंदोलन में प्रेम, समर्पण और भावनात्मक जुड़ाव को मानसिक शांति का मार्ग माना गया। भजन, कीर्तन और साधना को भावनात्मक संतुलन के साधन के रूप में स्वीकार किया गया।
शिक्षा व्यवस्था और मनोविज्ञान (1000–1600 ई.)
गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा केवल बौद्धिक नहीं बल्कि मानसिक और नैतिक विकास पर आधारित थी। गुरु–शिष्य संबंध प्रेरणा और अनुकरण का माध्यम था। मौखिक परंपरा से स्मृति शक्ति का विकास होता था। अनुशासन, आत्मसंयम और संयमित जीवन को मानसिक स्थिरता का आधार माना गया। यह व्यवस्था शैक्षिक मनोविज्ञान का व्यावहारिक उदाहरण थी।
सूफी और संत परंपरा (1200–1700 ई.)
सूफी संतों और भारतीय संतों ने आंतरिक शुद्धि पर बल दिया। ध्यान, संगीत और आत्मचिंतन को मानसिक शांति का साधन माना गया। अहंकार को मानसिक पीड़ा का मूल कारण बताया गया। सरल जीवन और संतुलित भावनाओं को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ा गया। यह परंपरा परामर्श और भावनात्मक मनोविज्ञान के निकट मानी जाती है।