.पतंजलि का योग और चित्त की अवधारणा (लगभग 500 ईसा-पूर्व)

प्राचीन भारतीय दर्शन में पतंजलि का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने योग नामक एक ऐसी  वैज्ञानिक और व्यावहारिक पद्धति प्रस्तुत की, जिसके द्वारा मन को नियंत्रित किया जा सकता है।

पतंजलि ने बताया कि योग —
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
अर्थात् योग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मन में उठने वाली चंचल वृत्तियों को नियंत्रित किया जाता है।

चित्त का मनोवैज्ञानिक स्वरूप

पतंजलि ने चित्त को केवल मन नहीं माना, बल्कि इसे मानसिक क्रियाओं की पूर्ण प्रणाली के रूप में समझाया। चित्त में चार तत्त्व शामिल हैं—

  1. मन – विचारों और भावनाओं का केंद्र
  2. बुद्धि – निर्णय और विवेक की शक्ति
  3. अहंकार – “मैं” की भावना
  4. स्मृति – पूर्व अनुभवों का संग्रह

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चित्त वह मानसिक संरचना है, जो सोच, अनुभव और व्यवहार को संचालित करती है।जब चित्त की वृत्तियाँ अनियंत्रित होती हैं, तब व्यक्ति—तनाव, चिंता, भय एवं अवसाद का अनुभव करता है। पतंजलि का योग इन वृत्तियों को शांत करने की प्रक्रिया है, न कि विचारों को दबाने की तकनीक।

             आज मनोविज्ञान विशेषकर नैदानिक मनोविज्ञान(Clinical Psychology),  मानसिक समस्याओं के उपचार में  –ध्यान (Meditation), योग, माइंडफुलनेस जैसी तकनीक का प्रयोग तनाव, चिंता और अवसाद के उपचार में  काफी बड़े पैमाने पर कर रहा है।

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